Wednesday, November 02, 2011

दिल जलाने को सितम्गर बहुत थे, एक आप भी जुड़ गये तो क्या हुआ...||

(c) शुभ्रा

October 28, 2011

Monday, May 16, 2011

राह-ए-ज़िंदगी

साँसे टूटी तो आखरी सफ़र
में आए लोग इतने
मगर राह-ए-ज़िंदगी
में शरीक हुए कितने?

(c) shubhra
May 16, 2011

Wednesday, February 23, 2011

शब्द कहीं गायब हैं...

कलम बेताब है
किताब के पन्ने इंतेज़ार में हैं
मन विचारों की हलचल से हैरान है
विचारों का उफान सब तरफ फैलने को हैं

पर शब्द कहीं गायब हैं,
इस माहौल से डरे हुए है
आखरी बार एक शहर की सकरी सी गली में
बने एक मकान के तीसरे माले में देखे गये थे...

(C) shubhra, February 23, 2011