Thursday, October 04, 2012

The Stream


The stream,
flows happily...

Gushing and meandering
through the mountains and plains
passing the big stones,
jumping onto the smaller ones
Spraying and splashing
in day it’s her shine
at night the sound
that leaves all spellbound.

Uncaring and unnerved by
the boulders,
the trees and
even the roads built over her.
She flows on
turning from a waterfall
to a stream to a waterfall again.
laughing and moving ahead.
STOP her and she turns,
taking a new path!

Passing the fields
the mountains
the villages
soothing one and all
by her magical gait.
Moves on undeterred
till she merges
happily losing her identity
and becoming one
with the river!

The stream
like the spirit and the soul
like a carefree teenage girl
hops, skips and jumps…
dancing to the tunes
of time
till she finds her abode!

The stream, 
flows happily!!


© Shubhra 3rd Sep 2012 (en-route village Turtuk, Laddakh)

तुम्हारा इंतज़ार है


तुम्हारा इंतज़ार है
आज से नही बरसों से
हर मौसम, हर साल, हर मौके पे

गर्मी आई, फिर सावन-भादों,
सब आके चले गये,
अपने अपने नियम अनुसार|

तुम किस मौसम का इंतज़ार कर रहे हो?
किस नियम को मानते हो?
कहाँ हो? 
क्यूँ हो दूर, जुदा, छुपे छुपे,
गुमनाम?

क्यूँ नही है तुम्हारा 
कोई रूप कोई रंग
कोई चाल, कोई ढंग

क्या तुम एक एहसास हो?
या एक सपना?
या फिर सिर्फ़ एक इच्छा 
जो कि दिल के किसी कोने से 
कभी कबाद आवाज़ देती है..

कौन हो तुम?
कैसे दिखते हो?
गर रास्ते में मिले कभी
तो कैसे पहचाने तुम्हे?

क्या गुमशुदा होने की रपट लिखाए?
मगर कैसे? 
न कोई नाम, न पता, न तस्वीर
कुछ भी तो नही है मेरे पास,

और अभी तो तुम्हे पाया ही नही
अपनाया ही नही
तो खोए कैसे? 
रपट लिखवाए कैसे?

जो अपना हो और जुदा हो जाए 
उसका शोक मनाते हैं
मगर शोक भी मनाए कैसे?
क्योंकि अभी तो तुम्हे पाना है
अपना बनाना है..

क्योंकि अभी तो तुम्हारा इंतज़ार है

हाँ अभी भी तुम्हारा इंतज़ार है||


(c) shubhra October 2011

Monday, April 30, 2012

मै नारीवादी हूँ...


मै नारीवादी हूँ,
आजसे नही वर्षों से
तब जब मै इस शब्द का मतलब भी नही जानती थी
और शायद इसके बीज तो बचपन में ही बो दिए गये थे...


गर्मी में छत पर 
दादी और बाबा के साथ सोते हुए
या सर्दी में रात को आग तापते हुए 
उनसे कहानी सुनते हुए...

शायद तब जब पहली बार सुना 
की राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली
या फिर तब जब गर्भवती होते हुए भी उन्हे घर से निकाल दिया 
राम ने?! जिनको दादी भगवान कह कर बुला रही थी... 
वो भी एक धोभि के कहने पे...

कुछ वर्ष बाद बड़ी बहन की शादी में 
पंडित फेरों के बाद वचन याद करा रहे थे...
तो मैंने दादी से पूंचा, जब राम ने ही अपने वकन नही निभाए 
तो और लोग कैसे निभाएँगे...
डाँट कर चुप करा दिया गया था...

महाभारत की कहानी सुनी 
और फिर टीवी पर देखी 
तो फिर से जागे वही सवाल...
युधिष्ठिर एक पति होते हुए 
अपनी पत्नी को ही जुए मैं हार गये?
द्रौपदी को कुंती ने पाँचो भाइयों में बाँट दिया?
अर्जुन कैसे बाँट सकता है अपनी पत्नी को...?
कृष्ण कैसे राधा के साथ रास कर के 
रुक्मणी के साथ शादी कर सकते हैं?

फिर अकल आई
मेरी खुद की सोच बनी
तो समझा, और ये जाना की 
अगर अपना रास्ता बनाना है
तो संघर्ष करना होगा
आवाज़ उठानी होगी
पहले घर में, फिर बाज़ार में
फिर समाज में.
सवाल करने पड़ेंगे
ज़रूरत पड़ी तो लड़ना होगा...
जिस समाज में भगवान की पत्नी को
इज़्ज़त नही मिली, 
वहाँ  किसी आम लड़की को कौन मान देगा...

मै नारीवादी हूँ,
इसलिए नही की आजकल ये एक चलन है
इसलिए भी नही की मैं कुछ साबित करना चाहती हूँ
मगर सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए 
की मुझे सीता और द्रौपदी नही बनना है. 
और मुझे राधा भी नही बनना||

(c) shubhra April 22, 2012

Saturday, February 04, 2012

बहुत कुछ करना है!

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|
डगर क़ठिन है, पर रास्ता बनाना है
कोई साथ हो ना हो, आगे बढ़ते जाना है

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

उमीद कभी टूटेगी, राह कभी छूटेगी
नई आशा जगाके, हताश दिल को बहलना है
पुराने रिश्ते टूटे तो नये दोस्त बनाना है
अपनो को मनाना और परायों को अपना बनाना है

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

उजली डगर पर चले थे, अब अंधेरे रास्ते अपनाना है
कल क्या हो पता नही, आज को पूरा जीना है
आज को पूरा जीना है और कुछ ऐसा करना है
कि हर ज़बान पे ये तराना हो
कल तक थी अंजान आज एक फसाना है|

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

(c) shubhra
November 21, 2011