Thursday, December 26, 2013

मगर सफ़र ख़त्म नही होते...

आज बहुत दिन बाद वो घर में अकेली थी, काम काज निपटा के वो थोड़ी देर धूप सेकने के  लिए बाहर आके बैठी| नीला आसमान, मीठी सी धूप और रेडियो मिर्ची पे मनपसंद गाना... "इतना  ना मुझसे तू प्यार बढ़ा, की मैं एक बादल आवारा..." 

उसने अपने बगीचे पे नज़र दौड़ाई, टमाटर के पौध में फूल आ रहे थे और गुलदावदी में कली... "ये पौधों का जीवन भी कितना हसीन है, एक सर्दी में ही शुरू से अंत तक का सफ़र तय हो जाता है... 
और यहाँ सदियान बीत जाती हैं मगर सफ़र ख़त्म नही होते..." उसने सोचा|

तभी  दरवाज़े की घंटी बजी देखा तो एक चिठ्ठी आई थी, लिखावट पहचानी हुई थी, कोरे पन्ने पे 24 पंक्तियों की एक कविता थी... पढ़ ही रही थी की फोन बजा, एक sms था, एक लाइन का, "he is no more..."

कभी कभी कुछ शब्द ही काफ़ी होते हैं कत्ल के लिए, और वो ये सोच रही थी कि... ये पौधों का जीवन भी कितना हसीन है, एक सर्दी में ही शुरू से अंत तक का सफ़र तय हो जाता है... 
और यहाँ सदियान बीत जाती हैं मगर सफ़र ख़त्म नही होते...

(c) shubhra 25th December, 2013

Wednesday, December 25, 2013

Sometimes…

Sometimes I am 
the poet 
sometimes 
the poem;
Sometimes I am 
the singer 
sometimes 
the song;
Sometimes I am 
the archer 
sometimes 
the arrow;
Sometimes I am 
the wound 
sometimes 
the blood trickling 
from your eyes…
Sometimes I am
me
and sometimes
I am you!!

© shubhra, 24th December, 2013

Tuesday, December 24, 2013

Love in times of Facebook- Haiku

I see you, your world,
green dot; do you see me too?
Love in times of Facebook.

(c) shubhra, 
18th December, 2013