Monday, April 30, 2012

मै नारीवादी हूँ...


मै नारीवादी हूँ,
आजसे नही वर्षों से
तब जब मै इस शब्द का मतलब भी नही जानती थी
और शायद इसके बीज तो बचपन में ही बो दिए गये थे...


गर्मी में छत पर 
दादी और बाबा के साथ सोते हुए
या सर्दी में रात को आग तापते हुए 
उनसे कहानी सुनते हुए...

शायद तब जब पहली बार सुना 
की राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली
या फिर तब जब गर्भवती होते हुए भी उन्हे घर से निकाल दिया 
राम ने?! जिनको दादी भगवान कह कर बुला रही थी... 
वो भी एक धोभि के कहने पे...

कुछ वर्ष बाद बड़ी बहन की शादी में 
पंडित फेरों के बाद वचन याद करा रहे थे...
तो मैंने दादी से पूंचा, जब राम ने ही अपने वकन नही निभाए 
तो और लोग कैसे निभाएँगे...
डाँट कर चुप करा दिया गया था...

महाभारत की कहानी सुनी 
और फिर टीवी पर देखी 
तो फिर से जागे वही सवाल...
युधिष्ठिर एक पति होते हुए 
अपनी पत्नी को ही जुए मैं हार गये?
द्रौपदी को कुंती ने पाँचो भाइयों में बाँट दिया?
अर्जुन कैसे बाँट सकता है अपनी पत्नी को...?
कृष्ण कैसे राधा के साथ रास कर के 
रुक्मणी के साथ शादी कर सकते हैं?

फिर अकल आई
मेरी खुद की सोच बनी
तो समझा, और ये जाना की 
अगर अपना रास्ता बनाना है
तो संघर्ष करना होगा
आवाज़ उठानी होगी
पहले घर में, फिर बाज़ार में
फिर समाज में.
सवाल करने पड़ेंगे
ज़रूरत पड़ी तो लड़ना होगा...
जिस समाज में भगवान की पत्नी को
इज़्ज़त नही मिली, 
वहाँ  किसी आम लड़की को कौन मान देगा...

मै नारीवादी हूँ,
इसलिए नही की आजकल ये एक चलन है
इसलिए भी नही की मैं कुछ साबित करना चाहती हूँ
मगर सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए 
की मुझे सीता और द्रौपदी नही बनना है. 
और मुझे राधा भी नही बनना||

(c) shubhra April 22, 2012

Saturday, February 04, 2012

बहुत कुछ करना है!

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|
डगर क़ठिन है, पर रास्ता बनाना है
कोई साथ हो ना हो, आगे बढ़ते जाना है

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

उमीद कभी टूटेगी, राह कभी छूटेगी
नई आशा जगाके, हताश दिल को बहलना है
पुराने रिश्ते टूटे तो नये दोस्त बनाना है
अपनो को मनाना और परायों को अपना बनाना है

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

उजली डगर पर चले थे, अब अंधेरे रास्ते अपनाना है
कल क्या हो पता नही, आज को पूरा जीना है
आज को पूरा जीना है और कुछ ऐसा करना है
कि हर ज़बान पे ये तराना हो
कल तक थी अंजान आज एक फसाना है|

बहुत कुछ करना है, आसमान छूना है
इरादे तो पक्के हैं, बस हौसला बढ़ाना है|

(c) shubhra
November 21, 2011

Wednesday, November 02, 2011

दिल जलाने को सितम्गर बहुत थे, एक आप भी जुड़ गये तो क्या हुआ...||

(c) शुभ्रा

October 28, 2011

Monday, May 16, 2011

राह-ए-ज़िंदगी

साँसे टूटी तो आखरी सफ़र
में आए लोग इतने
मगर राह-ए-ज़िंदगी
में शरीक हुए कितने?

(c) shubhra
May 16, 2011

Wednesday, February 23, 2011

शब्द कहीं गायब हैं...

कलम बेताब है
किताब के पन्ने इंतेज़ार में हैं
मन विचारों की हलचल से हैरान है
विचारों का उफान सब तरफ फैलने को हैं

पर शब्द कहीं गायब हैं,
इस माहौल से डरे हुए है
आखरी बार एक शहर की सकरी सी गली में
बने एक मकान के तीसरे माले में देखे गये थे...

(C) shubhra, February 23, 2011

Wednesday, October 27, 2010

मन का विष

मन का विष
आँखों के पानी
के साथ बहने दो;
अंदर रहा तो
आतो का अल्सर बन
सब खोखला कर देगा||

(C) shubhra, October, 25, 2010

Thursday, August 05, 2010

एक रात का वादा

उसने एक रात का वादा किया था

अब सारे दिन, इंतज़ाए करते हैं
न जाने कौन सा होगा वो दिन
जिस के अंत में शाम हाथ पकड़
रात के पास ले जाएगी

और पूरा हुगा एक रात का वादा|

(C) shubhra, August 5,2010