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If I were to be something else

If I were to be something else  tree I would be Devdar or a mighty oak Standing tall on the mountain slopes My roots be spread far and deep Entwined with the others near me Holding tight to the soil,  Rocks and water As would be my branches  Shooting up to the sky...  Bare and naked in autumn and winter Shedding all that I have   Carpet of brown leaves beneath On which I walk carefully In another world  Where I don this human form In the other months The branches lush green with foliage  Allowing the sun to sprinkle itself  From between to reach the ground As I sit under, In my human form, I capture the magic of light and shade...   Nothing lasts forever and fade we must Mightiest of trees also go...  So when time comes let me fall silently On a dark monsoon night Fall such that the path is not blocked That me in my human form can still walk past on The  hike to the jungles And occasionally rest on me for a while  As I tie my shoe lace.  A moment saved forever A tree (that's me) si
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I visit a mango orchard in Uttar Pradesh--my birth state.  Almost all, but a few trees had been harvested. They stood still, exhausted but happy after a bumper crop. The few which still bore the almost ripe chausa mango appear like a woman in full term. The fragrance of the leaves, the scent of the ripeness still on trees reach me with the light breeze caressing my being, all of it intoxicating. I am transported to my childhood home in Kanpur. We lived in a huge 3-storey house built by my grandfather. He had a green thumb and an immense love for fruiting trees. One because he loved fruits and two because he loved to light a fire each night during winter months, in our cozy fireplace and needed firewood. Our house had a mini    orchard. There were 5 mango trees, 4 lemon trees of different varieties, 1 pomegranate, 1  sweet lime, a chandan tree and a neem tree. A bougainvillea shrub, 2 gulmohar trees, 2 ashoka trees, chameli, kamini , lilies, roses, and bela . . .. Once in a whil

my experiments-- with three lines, a haiku anyone?

message sent blue ticks stare at me silence speaks (c) shubhra  October 17th, 2021 ++++++ conversations  in your head or mine unwired emotions (c) shubhra October 6, 2021  ++++++ pouring rain river like roads my WFH oasis (c) shubhra September 11, 2021 ++++++ thundering clouds rumbling inside unzen-like meditation (c) shubhra September 11, 2021 ++++++ Loaded mango tree— reminisce of my lost home baggage of the past (c) shubhra September 12, 2021

कौन थी, कैसी थी...

धूप की तरह बिखरी हुई सी कभी चांदनी सी पिघली हुई  होली के गुलाल सी उड़ती हुई  या बादलों सी  मस्त, आकाश में पैटर्न बनाती हुई  अजीब सी कुछ थी वो...  जहां जाती थोड़ा कुछ अपना छोड़ आती  कुछ थोड़ा उसका उठा लाती  समन्वय थी वो, मिली जुली...  जब गई तो,  बहुतों का जरा कुछ चला गया उसके साथ  कुछ ने बयान  किया ऐसे जैसे सबकुछ थी वो  कुछ  ने सिर्फ खामोश  अश्कों से उसे याद किया  मगर सबका थोड़ा कुछ चला गया उसके साथ  वो सब की थी  उसका कौन, किसी को नहीं पता  वो अपने साथ सबका कुछ ले गई  अपना क्या किसके पास छोड़ा किसी को नहीं पता...  अजीब सी थी, पर, क्या थी, क्यूँ थी क्या क्या छोड़ गई  और क्या क्या ले गई   कौन थी, कैसी थी,  क्यूँ थी, सब की थी  या किसी की नहीं  किसी को नहीं पता धूप की तरह बिखरी हुई सी या चांदनी सी पिघली हुई  रंग भरा पैलेट या खाली सफेद कैनवस अधुरी किताब या पूरी पेंटिंग किसी को नहीं पता किसी को कुछ नहीं पता बस ज़रा सी थी  बिखरी सी  यहां वहां  जाने कहाँ... (c) shubhra 13th February, 2020

खट खट!!

खट खट!! कौन है? हम चांद! चांद कौन? पूर्णमासी का चांद... अच्छा! तो क्या लाए हो? हम चाँदनी लाए हैं... पता है पूर्णमासी की चाँदनी में अमृत होता है... भला? हाँ! आज की चाँदनी जहां जहां टपकेगी वहाँ अमृत गिरेगा। तुमको चाहिए ये अमृत? तुम्हारे लिए खास ऑफर... अच्छा वो क्या? चाँदनी के साथ चांद फ्री!! (c) shubhra August 18th, 2019

आज बारिश लगातार हो रही है

आज बारिश लगातार हो रही है मूसलाधार... तेज़, काफी तेज़... घिर आए बादल कुछ घने, कुछ काले, कुछ बेचैन, कुछ नाराज कुछ उदास लेकिन सब भरे हुए... रोने को आतुर... बस अब थम नहीं रहे मानो सारे जहां का दर्द भरा हुआ हो सीने में, थम ही नहीं रहे! गुबार है कि सैलाब की तरह निकल रहा है... कभी लगा कि हवा के थपथपाने से कुछ सुकून आया, शायद थम रहे हैं, रुलाई, सिसकियों में बदल रही है... बिखर रहे हैं ये बादल... पर नहीं ये आज ना तो थमेंगे, ना ही बिखरेंगे, ना ही संभलेंगे... आज तो सब कुछ ही बाहर उड़ेल देंगे इतना सब कुछ तो है जो समेटे हुए हैं दिल में सब का जहां थामे हुए मेरा, तुम्हारा, उसका, इसका सबका... एक अकेला अम्बर आखिर कब तक बीमार का, बेरोज़गार का अकेले-तन्हा का भीड़ में  फंसे हुये का नज़रबंद का और आज़ाद का भी नास्तिक का और  भक्त का देसी का और विदेशी का भी सब कोई अपना सब कुछ इस आसमान से ही तो बांटते हैं... भर गया  आज इसका कलेजा, घिर आए बादल... इतने लोग इस धरती पे और एक आसमान अकेला सब का संसार ढकता हुआ उसका जिसके माँ-बाप नहीं या जिसके बच्चे नहीं जिसका रिश्ता टूटा या 

क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो?

ये सवाल मैं अक्सर करती हूँ अपने आप से... क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? जब चांद को देखते हो - क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? या जब मूसलाधार पानी बरसता है तब? मेट्रो पे जाते समय तो ज़रूर सोचते होगे? नहीं? झूठ! अच्छा प्रेस क्लब में तो कभी कभी राग भैरव गुनगुनाते हुए तो पक्का याद आती होगी... Netflix पे अनगिनत फ़िल्मों की लिस्ट देखते हुए क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? कौन सी देखे? जब कभी भी कोई पेंटिंग देखते हो तो क्या सोचते हो कि  आजकल मैं क्या बना रही हूँ? मेरा गुस्सा बाहर निकल रहा है या नहीं... क्या तुम सोचते हो पहाड़ की उस दोपहर/शाम के बारे में जो हमने साथ बिताई थी - अलबत्ता फोन पर... क्या तुम सोचते हो, भवाली के चांद के बारे में या फिर पहाड़ की डूबती शाम के बारे में? क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो जब कभी किसी आर्टिस्ट का, खासकर Van Gogh का या Da Vinchi का ज़िक्र होता है? जब कभी सर्कार की, मोदी की या कश्मीर की बात हो तो क्या तुम सोचते हो मेरे बारे में? उस रात के बारे में, जब कितने सब्र से तुम मुझे समझा रहे थे और मैं सवाल कर रही थी, समझने के लिए... कश्मीर मुद्दे को? क