मै नारीवादी हूँ, आजसे नही वर्षों से तब जब मै इस शब्द का मतलब भी नही जानती थी और शायद इसके बीज तो बचपन में ही बो दिए गये थे... गर्मी में छत पर दादी और बाबा के साथ सोते हुए या सर्दी में रात को आग तापते हुए उनसे कहानी सुनते हुए... शायद तब जब पहली बार सुना की राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली या फिर तब जब गर्भवती होते हुए भी उन्हे घर से निकाल दिया राम ने?! जिनको दादी भगवान कह कर बुला रही थी... कुछ वर्ष बाद बड़ी बहन की शादी में पंडित फेरों के बाद वचन याद करा रहे थे... तो मैंने दादी से पूंचा, जब राम ने ही अपने वचन नही निभाए तो और लोग कैसे निभाएँगे... डाँट कर चुप करा दिया गया था... महाभारत की कहानी सुनी और फिर टीवी पर देखी तो फिर से जागे वही सवाल... युधिष्ठिर एक पति होते हुए अपनी पत्नी को ही जुए मैं हार गये? द्रौपदी को कुंती ने पाँचो भाइयों में बाँट दिया? अर्जुन कैसे बाँट सकता है अपनी पत्नी को...? कृष्ण कैसे राधा के साथ रास कर के रुक्मणी के साथ शादी कर सकते हैं? ...
अप्रैल का महीना थोड़ा नर्म थोड़ा गर्म सन्तरा भी मिलता है और आम भी गोभी भी और भिंडी भी गरम पानी से नहाते है और कार में ऐसी चलाते हैं नए साल के प्लान बनाते हैं बीते साल के बही खाते टटोलते हैं अप्रैल का महीना थोड़ा नर्म थोड़ा गर्म ऐसे ही एक साल काफी गरम था अप्रैल का महीना अस्तित्व पिघला पहचान पिघली आमदनी पिघली लावा ही लावा था सब तरफ महीने बीते जलते जलते... फिर इस लावे में कुछ रंग मिलाए कुछ हिम्मत जुटाई कुछ इरादे किए कुछ मदद मांगी काफी तपस्या की काफी कुछ त्यागा इस अप्रैल के महीने से शुरुआत हुई एक नए सफर की मालूम नहीं था तब क्या अंजाम होगा सही गलत, अच्छा बुरा कौन जाने बस रंगों के साथ उधेडः-बुन में लग गए कभी जद्दोजहद, मायूसी, नाकामयाबी कभी पुरूस्कार, तारीफ और छोटी छोटी खुशियां कई पड़ाव पार किये... आज इस अप्रैल के महीने में आज ही के दिन पंद्रह साल पूरे हुए उस पिघलती दोपहर के जब ज्वालामुखी फटा था और लावा बहा था वहाँ आज एक न...