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कौन थी, कैसी थी...

धूप की तरह बिखरी हुई सी कभी चांदनी सी पिघली हुई  होली के गुलाल सी उड़ती हुई  या बादलों सी  मस्त, आकाश में पैटर्न बनाती हुई  अजीब सी कुछ थी वो...  जहां जाती थोड़ा कुछ अपना छोड़ आती  कुछ थोड़ा उसका उठा लाती  समन्वय थी वो, मिली जुली...  जब गई तो,  बहुतों का जरा कुछ चला गया उसके साथ  कुछ ने बयान  किया ऐसे जैसे सबकुछ थी वो  कुछ  ने सिर्फ खामोश  अश्कों से उसे याद किया  मगर सबका थोड़ा कुछ चला गया उसके साथ  वो सब की थी  उसका कौन, किसी को नहीं पता  वो अपने साथ सबका कुछ ले गई  अपना क्या किसके पास छोड़ा किसी को नहीं पता...  अजीब सी थी, पर, क्या थी, क्यूँ थी क्या क्या छोड़ गई  और क्या क्या ले गई   कौन थी, कैसी थी,  क्यूँ थी, सब की थी  या किसी की नहीं  किसी को नहीं पता धूप की तरह बिखरी हुई सी या चांदनी सी पिघली हुई  रंग भरा पैलेट या खाली सफेद कैनवस अधुरी किताब या पूरी पेंटिंग किसी को नहीं पता किसी को कुछ नहीं पता बस ज़रा सी थी  बिखरी सी  यहां वहां  जाने कहाँ... (c) shubhra 13th February, 2020
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खट खट!!

खट खट!! कौन है? हम चांद! चांद कौन? पूर्णमासी का चांद... अच्छा! तो क्या लाए हो? हम चाँदनी लाए हैं... पता है पूर्णमासी की चाँदनी में अमृत होता है... भला? हाँ! आज की चाँदनी जहां जहां टपकेगी वहाँ अमृत गिरेगा। तुमको चाहिए ये अमृत? तुम्हारे लिए खास ऑफर... अच्छा वो क्या? चाँदनी के साथ चांद फ्री!! (c) shubhra August 18th, 2019

आज बारिश लगातार हो रही है

आज बारिश लगातार हो रही है मूसलाधार... तेज़, काफी तेज़... घिर आए बादल कुछ घने, कुछ काले, कुछ बेचैन, कुछ नाराज कुछ उदास लेकिन सब भरे हुए... रोने को आतुर... बस अब थम नहीं रहे मानो सारे जहां का दर्द भरा हुआ हो सीने में, थम ही नहीं रहे! गुबार है कि सैलाब की तरह निकल रहा है... कभी लगा कि हवा के थपथपाने से कुछ सुकून आया, शायद थम रहे हैं, रुलाई, सिसकियों में बदल रही है... बिखर रहे हैं ये बादल... पर नहीं ये आज ना तो थमेंगे, ना ही बिखरेंगे, ना ही संभलेंगे... आज तो सब कुछ ही बाहर उड़ेल देंगे इतना सब कुछ तो है जो समेटे हुए हैं दिल में सब का जहां थामे हुए मेरा, तुम्हारा, उसका, इसका सबका... एक अकेला अम्बर आखिर कब तक बीमार का, बेरोज़गार का अकेले-तन्हा का भीड़ में  फंसे हुये का नज़रबंद का और आज़ाद का भी नास्तिक का और  भक्त का देसी का और विदेशी का भी सब कोई अपना सब कुछ इस आसमान से ही तो बांटते हैं... भर गया  आज इसका कलेजा, घिर आए बादल... इतने लोग इस धरती पे और एक आसमान अकेला सब का संसार ढकता हुआ उसका जिसके माँ-बाप नहीं या जिसके बच्चे नहीं जिसका रिश्ता टूटा या 

क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो?

ये सवाल मैं अक्सर करती हूँ अपने आप से... क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? जब चांद को देखते हो - क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? या जब मूसलाधार पानी बरसता है तब? मेट्रो पे जाते समय तो ज़रूर सोचते होगे? नहीं? झूठ! अच्छा प्रेस क्लब में तो कभी कभी राग भैरव गुनगुनाते हुए तो पक्का याद आती होगी... Netflix पे अनगिनत फ़िल्मों की लिस्ट देखते हुए क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो? कौन सी देखे? जब कभी भी कोई पेंटिंग देखते हो तो क्या सोचते हो कि  आजकल मैं क्या बना रही हूँ? मेरा गुस्सा बाहर निकल रहा है या नहीं... क्या तुम सोचते हो पहाड़ की उस दोपहर/शाम के बारे में जो हमने साथ बिताई थी - अलबत्ता फोन पर... क्या तुम सोचते हो, भवाली के चांद के बारे में या फिर पहाड़ की डूबती शाम के बारे में? क्या तुम मेरे बारे में सोचते हो जब कभी किसी आर्टिस्ट का, खासकर Van Gogh का या Da Vinchi का ज़िक्र होता है? जब कभी सर्कार की, मोदी की या कश्मीर की बात हो तो क्या तुम सोचते हो मेरे बारे में? उस रात के बारे में, जब कितने सब्र से तुम मुझे समझा रहे थे और मैं सवाल कर रही थी, समझने के लिए... कश्मीर मुद्दे को? क

चाँद को देखो

घर से बाहर निकल कर उसने आसमान को देखा, और देखती रह गयी... आज चाँद अधबुध था... पहाड़ों के ऊपर, सुनहेरा सा, अभी अभी उगता हुआ... काफी देर तक वो चाँद को ताकती रही... फोन से फोटो खींची वॉटस्‍प्प खोला, नाम ढूंढा, मैसेज टाइप किया "चाँद को देखो..." फिर मिटा दिया, फोन जेब में रखा और फिर चाँद को देखने लगी... अपने चार रम का कोटा पूरा कर वो प्रेस क्लब से बाहर निकला आसमां पे नज़र गयी, चाँद को देखा तो देखता रह गया... फोन निकाला, चेक किया, कोई मैसेज नहीं था... वॉटस्‍प्प खोला, नाम ढूंढा, टाइप किया "आज तुमने चाँद को देखा?" फिर मिटा दिया, फोन जेब में रखा और फिर चाँद को देखने लगा... अपने 23इसवे माले के घर में वो अकेला बैठा था... बाल्कनी में आया, सिगरेट जलाई और सामने देखा... देखता रह गया... चाँद आज अपने पूरे निखार पे था... फोन उठाया, वॉटस्‍प्प खोला, नाम ढूंढा मैसेज स्क्रोल किया... "चाँद को देखो! हम रहे ना रहे, जब कभी भी चाँद को देखना, खासकर  पूरे चाँद को, तो मुझे याद कर लेना..." मैसेज टाइप किया... "मिसिंग यू"... फिर मिटा दिया, फोन जेब में रखा, स

Hope

Barren trees, shapely, beautiful, not a leaf on board shooting up to the sky twisted, curved branches reaching out standing out among the greens tall and naked to the core calling to the heavens for just one, one green shoot and a cycle of hope again... (c) shubhra 2nd April, 2014

Love

If love was a poem a haiku it would be  say little feel a lot If love was clay bowl it would be  holding within it all If love was moon a full or a new crescent beautiful and surreal If love was sunshine hues of sunrise or of winter afternoon golden, warm and soft If love was a painting  Van Gogh's strokes spontaneous, colourful with hopes, dreams and agony If love was a rain a lightning thunderstorm at night and downpour;  a live concert..  If love was a hug bear hug it would be  embracing with all it has If love made love slowly and passionately move feeling each nook and corner before erupting in an orgasm If love was her a glow in the eyes, halo of white hair a  song in the heart...  gorgeous from core If love was you... a laughter that grips a smile that stirs the soul a heart that melts... or wait If love was you... it wouldn’t be love anymore logs of wood chopped from once beautiful Pine now simmering to ash on a cold winter